Sunday, 6 March 2016



बलराज सिंह सिद्धू प्रवासी पंजाबी लेखकों में से सबसे अल्प आयु का एक स्थापित और कददावर नाम है। 16 मार्च 1976 को जगराऊँ, जिला-लुधियाना में जन्में बलराज सिद्धू बचपन से ही इंग्लैंड के सीने में सिथति बर्मिंघम शहर में बसा हुआ है। उसने अपने श्रम, लगन, कला और विषयों की विलक्षणता के साथ पूरी दुनिया में अपने लिए विशाल पाठक वर्ग पैदा किया हुआ है। उसका शुमार इंग्लैंड के युवा और अधिक पढ़े जाने वाले लेखकों में होता है। पंजाबी साहित्य के क्षेत्र में बहुत सारे विषय ऐसे हैं, जिन पर सर्वप्रथम कलम आज़माइश सिर्फ़ बलराज सिद्धू ने ही की है। उसको प्रकिति द्वारा यह वर प्राप्त है कि वह जब अपने हुनर और कला द्वारा नवीन दृषिटकोण से बेबाकी के साथ कोइ बात लिखता है तो पुराने कलमकारों द्वारा बनाइ सारी धारणायें रदद करके पाठकों के मनों में एक नया बिंब उभार देता है। बलराज सिद्धू कहानी लिखने के लिए जन्मा है या कहानी का आविष्कार बलराज सिद्धू के लेखन के लिए ही हुआ है, इसका निर्णय करना कठिन है। उसकी पुस्तकों की बिक्री और फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग मीडिया पर उसकी रचनाओं को मिलने वाले हुंकारे ने यह सिद्ध किया है कि शिव कुमार बटालवी (पंजाबी कवि) के बाद नौजवान सित्रयों द्वारा शिददत से यदि किसी पंजाबी साहित्यकार को पढ़ा जाता है तो वह बलराज सिंह सिद्धू है। बलराज सिद्धू शब्दों का ऐसा शिल्पकार है कि उसका जादू पाठक के सिर पर चढ़कर बोलता है और उसकी कोई भी रचना पढ़ते समय बीच में छोड़ पाना असंभव हो जाती है। 

कहानी -औरत, घोड़ा और तलवार


मालवा में स्थित उतरी भारत की रियासत राजगढ़ को महाराजा उदयराज सिंह के पूर्वज महाराजा राज सिंह ने बसाया था। इसकी राजधानी उस समय चश्मा हुआ करती थी। परंतु महाराजा उदयराज सिंह के पिता महाराजा रणराज सिंह ने अपने शासनकाल के दौरान संगरूर को राजधानी बना लिया। उसने राजधानी से दस किलोमीटर की दूरी पर अपने रहने के लिए ‘राजगाह’ नामक एक आलीशान महल भी निर्मित करवाया। राजधानी बदलने का मुख्य कारण रियासत पटियाला से पुश्तों से चलती आ रही अनबन थी। वैसे तो रियासत पटियाला के शासक और महाराजा उदयराज सिंह का कुल, 1168 ई. में जैसलमेर को बसाने वाले यादववंशी रावल जैसल भट्टी की सातवीं पीढ़ी में 1314 ई. में पैदा हुए महान योद्धा सिद्धू राव (जिससे सिद्धू- बराड़ों का वंश चला) से मिलता है। रियासत पटियाला और रियासत राजगढ़ के शासकों का बुजु़र्ग हालांकि एक ही था, पर कुछ राजनीतिक कारणों से दोनों रियासतों में दुश्मनी पड़ गई थी, जो लम्बे समय तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती गई। यह वैर पटियाला रियासत के संस्थापक बाबा आला सिंह और महाराजा उदयराज सिंह के बुजु़र्ग महाराजा युवराज सिंह की मित्रता के उपरांत खत्म हुआ। दोनों रियासतों के सिद्धू सरदारों ने एक-दूसरे की रियासत में दख ़लअंदाजी न करने की लिखत रूप में विशेष संधि भी की थी। महाराजा युवराज सिंह ने बाबा आला सिंह को बरनाला रियासत के नाम केवल तीस गांवों और चैरासिये (चैरासी गांवों वाली रियासत मौजूदा संगरूर) पर कब्ज़ा करने में मदद की थी। बल्कि 1731 ई. में रायकोट के राय किला के साथ हुए युद्ध में भी भारी जंगी मदद दी थी।




Saturday, 5 March 2016

कहानी -धर्म

 -बलराज सिंह सिद्धू (अनुवाद : सुभाष नीरव)

नितनेम का पाठ जपते, ध्यान मग्न बैठे जत्थेदार भाग सिंह ने निगाह ऊपर उठा आकाश की ओर घुमाई। चारों तरफ से आसमान साफ़ है। उसने मुँह ऊपर उठाकर भवें ऊपर चढ़ाईं ताकि आँखें कुछ अधिक खुल जाने पर जितनी दूर तक देखा जा सकता था, देखा जा सके। परंतु उसको कहीं भी धूल उड़ती नज़र नहीं आई। दूर से अपनी ओर आने वाले व्यक्ति का पता लगाने का जत्थेदार भाग सिंह का यह अपना ही निराला ढंग है। क्योंकि इधर-उधर रेतीले उजाड़ों में जब भी घोड़े दौड़ते हैं तो उनके खुरों से उखड़ी मिट्टी हवा में मिलकर अम्बर में फैल जाती है। इस उड़ती मिट्टी और उसकी मात्रा को देखकर जत्थेदार कई मील दूर खड़ा होकर अंदाज़ा लगा लेता है कि कहाँ से, किधर से और कितने व्यक्ति आ रहे हैं।इसी प्रकार निजी अनुभवों के द्वारा खोजी हुई और भी बहुत सारी विधियाँ हैं जिन्हें जत्थेदार अपनी लड़ाई और हर मुहिम के दौरान इस्तेमाल करता है। जैसे कि रात के समय चाँद की स्थिति से गणना करके वह अँधेरे में ही विशाल और घना जंगल छान मारता है और बिना किसी परेशानी के अपने असली ठिकाने पर पहुँच जाता है। जत्थेदार की ऐसी सूझ, समझदारी और सुलझेपन के कारण ही उन मुट्ठीभर सिक्खों की टोली, हमेशा विशाल मुगल फौज के लश्कर को चमका देकर निकल जाती रही है।