Saturday, 5 March 2016

कहानी -धर्म

 -बलराज सिंह सिद्धू (अनुवाद : सुभाष नीरव)

नितनेम का पाठ जपते, ध्यान मग्न बैठे जत्थेदार भाग सिंह ने निगाह ऊपर उठा आकाश की ओर घुमाई। चारों तरफ से आसमान साफ़ है। उसने मुँह ऊपर उठाकर भवें ऊपर चढ़ाईं ताकि आँखें कुछ अधिक खुल जाने पर जितनी दूर तक देखा जा सकता था, देखा जा सके। परंतु उसको कहीं भी धूल उड़ती नज़र नहीं आई। दूर से अपनी ओर आने वाले व्यक्ति का पता लगाने का जत्थेदार भाग सिंह का यह अपना ही निराला ढंग है। क्योंकि इधर-उधर रेतीले उजाड़ों में जब भी घोड़े दौड़ते हैं तो उनके खुरों से उखड़ी मिट्टी हवा में मिलकर अम्बर में फैल जाती है। इस उड़ती मिट्टी और उसकी मात्रा को देखकर जत्थेदार कई मील दूर खड़ा होकर अंदाज़ा लगा लेता है कि कहाँ से, किधर से और कितने व्यक्ति आ रहे हैं।इसी प्रकार निजी अनुभवों के द्वारा खोजी हुई और भी बहुत सारी विधियाँ हैं जिन्हें जत्थेदार अपनी लड़ाई और हर मुहिम के दौरान इस्तेमाल करता है। जैसे कि रात के समय चाँद की स्थिति से गणना करके वह अँधेरे में ही विशाल और घना जंगल छान मारता है और बिना किसी परेशानी के अपने असली ठिकाने पर पहुँच जाता है। जत्थेदार की ऐसी सूझ, समझदारी और सुलझेपन के कारण ही उन मुट्ठीभर सिक्खों की टोली, हमेशा विशाल मुगल फौज के लश्कर को चमका देकर निकल जाती रही है।
इस वक्त मुगलिया सल्तनत अपने शिखर पर है। सत्रहवीं सदी के मध्यकाल का यह दौर हिंदुओं और सिक्खों के लिए कोप का समय है। मुसलमान हुक्मरानों ने क़हर की आँधी बहा रखी है। जबरन इस्लाम फैलाने की खातिर शेष सभी धर्मों को खत्म किया जा रहा है। हर तरफ अफरा-तफरी मची हुई है। आए दिन हिंदुस्तान की अस्मत मिट्टी में रौंदी जा रही है। ग़ैर-मुसलमानों को इस्लाम धारण करवाने के लिए पहले तो लालच दिए जाते हैं। ये लालच ऊँचे ओहदों, जागीरों, धन-दौलत, महंगे तोहफों और हसीन स्त्रियों के होते हैं। किस व्यक्ति को कौन-सा लालच देना है, यह गै़र-इस्लामी इन्सान के हठ पर निर्भर करता है। कई बार तो स्थिति यहाँ तक आ जाती है कि मुसलमान अहलकार काफि़रों को मोमिन बनाने के लिए अपनी बहु-बेटियाँ और बहनें तक दे देते हैं। इसकी एवज में मुसलमान ओहदेदारों को दिल्ली दरबार से भारी इनाम और तरक्कियाँ मिलती हैं। लालचवश बहुत सारे लोग अपना धर्म छोड़ देते हैं। जो लोभ में नहीं आते, उन पर दबाव डाला जाता है। ज़मीन-जायदादें ज़ब्त कर ली जाती हैं। बेटियाँ, बहनें और माँएँ उठवा ली जाती हैं। कैद करके तरह-तरह की यातनाएँ दी जाती है। अन्त में, यदि कोई अपना दीन न छोड़े तो उसको जान से मार दिया जाता है। समूचे हिंदुस्तान को मुसलमान बनाने की होड़ में हुकूमत गै़र इस्लामियों का बीजनाश करने पर तुली हुई है।अभी कुछ दशक पहले ही अस्तित्व में आया नवीन सिख धर्म लोकमन में अपनी अच्छी-खासी पैठ बना गया है। सिख एक शक्तिशाली और जंगजू कौम के तौर पर उभर रहे हैं। यद्यपि बहुसंख्यक सिखों की पृष्ठभूमि हिंदु धर्म से संबंध रखती है, परंतु भारी मात्रा में मुसलमानों ने भी इस नए धर्म को अपना लिया है और अपनाये जा रहे हैं। दोनों पुराने धर्मों की खूबियों का निचोड़ और खामियों से रहित बिल्कुल खालिस दीन है यह। इसीलिए इस सिख धर्म के लोग अपने आपको खालसा भी कहते हैं। ये सिख अपने धर्म के बड़े पक्के हैं। महा जिद्दी और सिरे के कट्टर। खोपडि़याँ उतरवा देते हैं। शरीर का हर जोड़ कटवा देते हैं। आरियों से चीरे जाते हैं। बच्चों के टुकड़े करवाकर गले में लटका लेते हैं। पर किसी भी कीमत पर अपना धर्म छोड़ने को तैयार नहीं होते। मुगलों को सिख शूलों की भाँति चुभ रहे हैं। इसलिए मुगलों ने सबसे पहले सिक्खों को खत्म करने के लिए आतंक मचा रखा है। सरकार ने घोषणा की हुई है कि जहाँ कोई सिख दिखता है, उसे मौके पर ही क़त्ल कर दिया जाए। सिक्खों के सिरों की कीमत डाली जा रही है। सिख गिनती में एक तो पहले ही थोड़े हैं, ऊपर से रोज़ रोज़ की क़त्लोगारत से उनकी संख्या में और अधिक कमी होती जा रही है। गांवों-शहरों में सिखों का रहना खतरे से खाली नहीं है। मजबूरन सिक्खों को घरबार त्याग कर जंगलों, टीलों, पहाड़ों, सुरंगों, बियाबानों या रेगिस्तानों में डेरे लगाने पड़ गए हैं।ऐसे ही जत्थेदार भाग सिंह के जत्थे ने एक बीड़ में शरण ली हुई है। चारों तरफ सघन सरकंडेदार जंगल है। यहाँ से जत्थेदार भाग सिंह द्वारा कुछ अन्य सिंहों को साथ मिलाकर फौज को संगठित करना है ताकि मुगल साम्राज्य की जड़ें उखाड़कर खालसा राज स्थापित किया जा सके। अब भी जब कहीं अवसर मिलता है तो जत्थेदार भाग सिंह और उसके साथी तूफान की तरह जाते हैं और मुगल हाकिमों और नवाबों को लूटते, मारते और उनकी बरबादी करके लौट आते हैं। उनकी यह क्रिया ऐन वैसी होती है जैसे कोई साँप बिल में से निकले, किसी को डसे और फिर वापस बिल में घुस जाए। सिख वारदात करके फरार हो जाते हैं और सब देखते रह जाते हैं। सिख किधर से आते और किधर को जाते हैं, किसी को इसका कुछ पता नहीं लगता।अजीब किस्म की मिट्टी के बने हैं ये सिख। मु्ट्ठी भर अनाज और फलों के साथ कई कई दिन गुज़ार लेते हैं। वैसे भी इनकी खाद-खुराक कोई विशेष नहीं होती। कोई मूली, गाजर, गन्ना, कचरी, करीर के फल, भुट्टे, कीकर की फलियाँ... जो हाथ आए, पेट को सहारा देने के लिए ‘सतिनाम वाहिगुरू’ कहकर छक जाते हैं। जब चारों तरफ से कुछ न मिले तो शाकाहारी होने के बावजूद मजबूरन ये मेमनों का सेवन भी कर लेते हैं।जंगल में रात के मय साँप-बिच्छुओं का भी डर रहता है। इसलिए रात में थोड़ा-बहुत जो दो घड़ी सोना होता है, सिख घोड़ों की काठियों पर बैठे बैठे ही नींद का झोंका ले लेते हैं। प्रतिदिन ये दिन भर शस्त्रों के साथ युद्ध विद्या का अभ्यास करते रहते हैं। कुश्तियों और लाठी चलाने का खेल खेलते रहते हैं। खुद तो सिख गांव-शहरों में नहीं रह सकते, लेकिन भेष बदलकर सिक्खों के गुप्तचर हमेशा नगरों में घूमते रहते हैं। जब कोई काम की ख़बर होती है, वे तुरन्त सिख सरदारों तक पहुँचा देते हैं। इस पर सरदार तुरंत आवश्यक कार्रवाई करते हैं। जासूसों द्वारा उपलब्ध करवाई गई ये ख़बरें कई प्रकार की होती हैं। जैसे --शाही किले को जा रहे हथियारों का रथ कब, कहाँ से गुजरेगा और उसको किस वक्त और किस स्थान पर लूटा जा सकता है।-सरकारी खजाने का तबादला कब, कहाँ से और कहाँ के लिए होना है।-कर उगाही करके आ रही मोहरों से भरी बग्घी कब और कैसे लूटनी है।-किस धनाढ्य ने कहाँ कितना धन छुपा रखा है और कब डाका मारना है।-किस ज़ालिम, दुश्मन और दोषी का सफाया करना है... आदि आदि।या फिर, कई बार गरीबों और मज़लूमों को मदद की ज़रूरत होती हो, तो वैसी ही उनकी सेवा का प्रबंध करके देने के बारे में भी जानकारी लेकर आना इन गुप्तचरों की ही जिम्मेदारी होती है।इसी प्रकार, चार दिन पहले एक गुप्तचर ख़बर के साथ साथ अपने संग एक नौजवान को लेकर आया था। वह जवान शादी होने के उपरांत गौना लेकर अपने घर लौट रहा था। रास्ते में एक मुगल नवाब ने उसका डोला लूट लिया था] सारे बारातियों को मारपीटकर भगा दिया था और दाज-दहेज छीन लिया था। नौजवान शर्म का मारा खाली हाथ अपने गांव भी नहीं जा सकता था। वह तो जिल्लत और अपमान का मारा कुएँ में छलांग लगाकर मरने जा रहा था कि सिख गुप्तचर की निगाह पड़ गई। गुप्तचर ने उसको बचा लिया था और मदद करने का वायदा करके जत्थेदार भाग सिंह के पास ले आया था। नौजवान ने रो रोकर जत्थेदार के सम्मुख फरियाद की थी। 

जत्थेदार ने उसको दिलासा दिया था, “बेटा, रो मत। वाहिगुरू भली करेगा।”

डोली लूट लेने की घटना हुए को अधिक समय नहीं बीता था। लुटेरा हाकिम किस राह पर और किस दिशा में गया था, इसकी सारी सूचना गुप्तचर ने दे दी थी। जत्थेदार ने घोड़ी पर बैठे बैठे एक बार अपने सारे साथियों के साथ नज़रें मिलाई थीं। सबको पूरी तरह तैयार देखकर एक गहरी भेदभरी दृष्टि के साथ हुक्म किया था और एक साथ सभी ने अपने अपने घोड़ों को ऐडि़याँ छुआ दी थी। हवा को चीरते हुए ग्यारह घोड़े बारह सवारों को लेकर ऊबड़-खाबड़ राहों से आगे बढ़ने लगे थे। मुगल हाकिम अभी अपने किले तक भी नहीं पहुँचा था कि सिंहों ने उसे जा दबोचा था।

“काफिर रांगले(सिख आ गए)...काफि़र रांगले...काफि़र रांगले...।” जब एक पठाने ने सिक्खों के दस्ते को देखकर अपने बाकी लोगों को सूचित किया था तो सारी मुगलिया टुकड़ी के साँस सूख गए थे। मुजरे में नाचती कंजरी के पैरों में बंधे घुंघरूओं की तरह तलवारें खड़कने लगी थीं। अचानक हुए सिंहों के हमले से दहशतज़दा हुआ मुसलमान हाकिम अपनी तोड़ेदार बन्दूक में अभी बारूद भरने की कोशिश कर ही रहा था कि फुर्ती दिखाते हुए जत्थेदार भाग सिंह ने किरपान के एक ही वार से उसे दोनों हाथ कलाई पर से काटकर बन्दूक समेत नीचे फेंक दिए थे। दूसरे वार में किरपान की नोंक हाकिम की छाती में घुसकर कमर में से निकल गई थी। एक जबरदस्त झड़प के बाद सिक्खों के पैरों में मुसलमानों के पैंतीस सिरों की मंडी लग गई थी।

“जान बख़्शी ! जान बख़्शी !!“ करते हुए दो डोले उठाये आठ कहार थर्र-थर्र काँप रहे थे। उन्हें सिख मौत का परवाना अजराइल अर्थात यमदूत का समरूप लगते थे।घोड़े पर बैठे बैठे ही जत्थेदार भाग सिंह एक डोली की परिक्रमा करता हुआ कहारों को सम्बोधित हुआ था, “डरो नहीं। खालसा निहत्थे और बेकसूर पर वार नहीं करता। तुम तो नौकर हो। जाओ, तुम्हें हम कुछ नहीं कहेंगे। चलो, भागो यहाँ से।”कहारों ने डोले छोड़कर पीछे मुडकर देखा भी नहीं था। बस, वहाँ से भागने की ही की थी उन्होंने।


जत्थेदार भाग सिंह ने छोटी डोली के समीप जाकर हांक लगाई थी, “बेटी, बाहर आ जाआ।... डरो नहीं। हम सिख हैं।”कुछ देर जत्थेदार ने इंतज़ार किया था। जब अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई थी तो जत्थेदार और ऊँची आवाज़ में बोला था, “घबराने की कोई ज़रूरत नहीं, मेरी पुत्री! हमने मुगलों के टिड्डी दल को मार दिया है। मेरी बेटी, तुम बेखौफ होकर डोली में से बाहर पैर रखो। यहाँ सिर्फ़ अकालपुरुष की फौज है।” बहुत देर तक जत्थेदार भाग सिंह देखता रहा था। डोली में कोई हलचल नहीं हुई थी।“जत्थेदार साहब।” डोली के पर्दे की नीचे से रिसते रक्त की ओर उंगली करके एक बुजुर्ग ने इशारा किया था।लहू देखते ही जत्थेदार टांग घुमाकर तुरंत घोड़ी पर से उतरा था और दौड़कर उसने अपनी नंगी तलवार के सिरे से डोली का परदा ऊपर उठा दिया था।इस डोली में दुल्हन के साथ आई हुई नाइन अपने पेट में खुद ही खंजर घोंपकर मरी पड़ी थी। जत्थेदार भाग सिंह के लिए यह कोई बुझारत या अलौकिक कार्य नहीं था। इन दिनों में इस प्रकार की घटनायें आम ही घटित होती रहती थीं। हिंदुओं, सिखों और निर्धन मुसलमानों की कन्याओं (खास तौर पर हसीन लड़कियाँ) अपने साथ हर समय छुरी, चाकू या छोटी खड़ग आदि कोई न कोई तीखा औज़ार अवश्य रखती थीं। चूंकि सुन्दर स्त्रियों को देखते ही पठान जबरन उठाकर अपने हरमों में ले जाते या मौके पर ही उनके साथ मुँह काला करते थे। ऐसी स्थिति में बहुत सारी स्त्रियाँ अपनी आबरू लुटने से पहले ही तीखे हथियार से आत्महत्या कर लिया करती हैं। कभी कभार कोई बहादुर नवयौवना उस शस्त्र से अपने शत्रु को ही खत्म कर दिया करती है। इसलिए नाइन द्वारा आत्महत्या कर लिए जाने का सारा माजरा समझने में जत्थेदार भाग सिंह को ज़रा भी देर न लगी थी।नाइन की लाश देखकर जत्थेदार का दिल ज़ोर से धड़का था। तुरंत ही जत्थेदार दूसरी डोली की ओर बढ़ा था। डोली के अंदर झांकते ही जत्थेदार ने देखा था कि दुल्हन नंगा खंजर पकड़े जीती जागती सहमी हुई बैठी थी। डोली में दाखि़ल हुआ मर्दाना सिर देखकर दुल्हन अपनी गर्दन में खंजर मारने ही वाली थी कि जत्थेदार ने खंजर की धार को अपने हाथ में पकड़ लिया था। दुल्हन ने दोनों हाथों के साथ ज़ोर लगाकर खंजर को जितना आगे की ओर अपने पेट के पास ले जाने की कोशिश की थी, उससे अधिक बल का प्रयोग करके जत्थेदार ने उसको पीछे की ओर खींचा था। जत्थेदार भाग सिंह की मुट्ठी में कसे हुए दो धारी खंजर की नोंक में से टपकती लहू की धार को देखकर यूँ लगता था जैसे वह जत्थेदार का खून नहीं बल्कि खंजर का लहू हो जो जत्थेदार के दबाने से निचुड़ रहा हो।“डर नहीं बेटी। मैं गुरू गोविंद सिंह का खालसा हूँ। तेरी रक्षा के लिए आया हूँ।” जत्थेदार भाग सिंह के ये शब्द, बड़ी आयु, सिखी स्वरूप और खालसाई बाना देखकर दुल्हन ने खंजर वहीं छोड़ दिया था। जत्थेदार ने अपना रक्तसना हाथ और सिर, दोनों डोली से बाहर निकाल लिए थे। एक अन्य वृद्ध सिंह घोड़े पर से उतरकर आया था। उसने अपने कमरकसे के साथ जत्थेदार भाग सिंह के रक्त से लथपथ हाथ को बांधकर दुल्हन के सही-सलामत होने की तसदीक करनी चाही थी, “पुत्री आ... डोली से बाहर निकल... अपना हाल चाल और आपबीती बता।”वृद्ध आवाज़ सुनकर लम्बा-सा घूंघट निकाले लाल रंग के सुहाग जोड़े में कैद किए पठानी स्त्रियों जैसे अपने आकर्षक वजूद वाली दुल्हन बाहर निकली थी। दुल्हन के बताने के अनुसार वह ठीकठाक और अनछुई ही थी। डोली पर मुगलों के काबिज़ होने के बाद से अब तक के सफ़र के दौरान कुछ भी असुखद नहीं घटा था।दूल्हा-दुल्हन को उनके घर पहुँचाने के लिए जत्थेदार ने दूल्हे से उसका पता-ठिकाना पूछा था। जो पता उसने बताया था, वह ठिकाना वहाँ से काफी दूर था। ऊपर से हालात भी बहुत बुरे थे। जत्थेदार के लिए यह नई मुश्किल खड़ी हो गई थी। बड़ा ही नाजुक समय था। खालसों के जंगबाज तो पहले ही कम थे और फिर कोई घोड़ा भी फालतू नहीं था। जत्थेदार भाग सिंह सोच में पड़ गया था। अकेले वे दोनों दूल्हा-दुल्हन जा नहीं सकते थे और अपनी फौज को उनके साथ जत्थेदार भेज नहीं सकता था। उनके साथ भेजे तो किसे भेजे ?कोई ऐसा दिलेर मर्द चाहिए था जो न सिर्फ़ दूल्हा और दुल्हन को सुरक्षित उनके घर छोड़कर आए, बल्कि खुद भी बिना किसी नुकसान के जिन्दा लौटकर आए। क्योंकि ऐसे कलमुँहे दिन आ गए थे कि सिक्खों का आबादी वाली जगह पर जाना तो मौत को मौसी कहने के समान बना हुआ है। हवायें भी सिखों की दुश्मन और ज़हरीली बनी हुई हैं। पत्ता-पत्ता सिंहों का बैरी बना हुआ है।खबरची के घोड़े पर से उतरकर अपनी दुल्हन के साथ खड़ा दूल्हा जत्थेदार के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था।जत्थेदार को असमंजस में देखकर दूर से घोड़ी दौड़ाता हुआ सिपाही निर्भय सिंह आगे बढ़कर आया था, “इस जोड़े को सुरक्षित घर पहुँचाने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी जाए। मैं इन्हें अपनी जान पर खेलकर बिना कोई आँच आए छोड़कर आऊँगा।”जत्थेदार भाग सिंह के चेहरे पर प्रसन्न्ता की लाली फैल गई थी। निर्भय सिंह अकेला सिपाही ही नहीं था, बल्कि उसका पुत्र भी था। यद्यपि जत्थेदार भाग सिंह जानता था कि वह अपने दल में से जिसको भी आदेश देगा, कोई भी उसके आदेश को नहीं ठुकराएगा। बात पूरी भी न होगी कि वह चल देगा। परंतु जत्थेदार भाग सिंह यह नहीं चाहता था कि बाद में उसके साथी सोचे कि जत्थेदार ने अपने पुत्र को छोड़कर किसी अन्य को मौत के मुँह में क्यों भेजा ?“ठीक है निर्भय सिंह, शीघ्र जा और इन्हीं पैरा लौट आ। जाओ भाई, इसके साथ। तुम्हारी चिंता में तुम्हारे परिवार वाले रो रोकर आधे हो गए होंगे।”जत्थेदार का आदेश मिलते ही दूल्हे ने घोड़ी की रकाब में पैर फंसाया और उछलकर निर्भय सिंह के पीछे उसको पकड़कर बैठ गया था। निर्भय सिंह के पीछे घोड़ी पर दुल्हन के बैठने के लिए बिल्कुल भी जगह नहीं बची थी। अन्य घोड़ा भी खाली नहीं किया जा सकता था। तभी उस दल में से किसी बाबा ने सलाह दी कि दुल्हन आगे बैठ जाए। अभी और किसी ने इस मशवरे को कबूल किया भी नहीं था कि घोड़ी की खुच पर पैर रखकर वह औरत कूदकर निर्भय सिंह के आगे एकतरफ टांगें करके बैठ गई थी। बहुत भारी घाघरा पहने होने के कारण उससे आदमियों की तरह दोनों तरफ टांगे करके बैठना असंभव था।तीन जन घोड़ी पर बैठ चुके थे। सबको फतह बुलाकर निर्भय सिंह ने घोड़ी को हांकने के लिए उसकी लगाम को झटका दिया था। शान से पैर उठाती घोड़ी सभी के देखते देखते कच्ची पगडंडी पर गर्द-ओ-गुबार में गायब हो गई थी।उनके जाने की देर थी कि खालसा फौज ने मुगलों के गिरे पड़े अपने काम के अस्त्र-शस़्त्र उठा लिए थे और जत्थेदार ने सभी को वहाँ से चलने के लिए कहा।सिंहों के ‘बोले सो निहाल, सतिश्री अकाल’के जयकारे फिज़ा में गूंजने लगे थे। दगड़-दगड़ करते सब सिंहों के घोड़े उस जंगल की ओर दौड़ पड़े थे जहाँ पर उनका निवास स्थान था।निःसंदेह दूल्हा और दुल्हन निर्भय सिंह की शरण में पूर्ण सुरक्षित थे। पर फिर भी सहमे हुए एक शब्द भी नहीं बोले थे। कुछ दूर जाने के बाद सफ़र की बेजारी खत्म करने के लिए निर्भय सिंह ने दूल्हे से पूछा था, “क्यों भाई साहब, आप ठीक तो बैठे हो ?““हाँ जी, हाँ जी। आप घोड़ी दौड़ाये चलो।”उतावलेपन में बोलते दूल्हे का उत्तर सुनकर निर्भय सिंह ने उसकी दुल्हन से प्रश्न किया था, “और आप बीबी जी, तंग तो नहीं हो रहे ?“लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया था। हालांकि घोड़ी पर अधिक जगह नहीं थी, फिर भी निर्भय सिंह ने उस लड़की के शरीर के साथ लगते अपने जिस्म को अलग रखने के यत्न में अपने शरीर को ‘वाहेगुरू-वाहेगुरू’ बोलकर सिकोड़ा था।“मैंने बीबी जी आपसे पूछा था। तंग तो नहीं हो रहे ?“ निर्भय सिंह ने दुबारा पूछा था।“ज..ज... जी नहीं।” लड़की की घबराहट के साथ काँपती आवाज़ में से बजते हुए जलतंरग के पानी की भांति थिरकते-से शब्द निकले थे।लड़की की रसना में से चंद बोल सुनकर ही निर्भय सिंह का सारा शरीर लरज गया था। बेशक वह कई वर्षों बाद यह आवाज़ सुन रहा था, पर फिर भी उसको इस आवाज़ को पहचानने में कोई कठिनाई नहीं हुई थी। “रूप !“ यह शब्द निर्भय के मुँह से बाहर आते-आते उसके कंठ में ही कहीं अटक गया था। निर्भय सिंह का दिल ज़ोर-ज़ोर से ऐसे धड़क रहा था मानो वह दौड़ती घोड़ी के बराबर भाग रहा हो। नहीं। उससे भी आगे... बहुत तेज गति के साथ।उसके बाद निर्भय सिंह का दिमाग अपने ठिकाने पर नहीं रह सका था। उसके मन में से चीखें निकलने लगी थीं और एक आह-सी उसके अंतर्मन तक उतरती चली गई थी। कुछ पलों तक वह कुछ नहीं बोल सका था और एक पत्थर बना हिलती हुई घोड़ी पर अडोल बैठा रहा था। यद्यपि शक की तो कोई गुंजाइश नहीं रही थी, फिर भी पूरी तसल्ली करने के उद्देश्य से निर्भय सिंह बोला था, “आप दोनों में से जो भी तंग हो रहा हो तो बता देना।”“नहीं... नहीं जी, ठीक है। फिक्र न करो आप।” दूल्हा बोलकर चुप हो गया था।निर्भय सिंह को आस थी कि दुल्हन भी कुछ न कुछ तो अवश्य ही मुँह से फूटेगी। पर नहीं, वह खामोश रही थी। निर्भय सिंह बुलाना तो उसे ही चाहता था। कुछ सोचकर निर्भय सिंह ने दुबारा बहाना बनाया था, “क्यों बीबी, आपको प्यास तो नहीं लगी ?““हाँ जी, होंठ तो सूख रहे हैं।” लड़की द्वारा इतना कहने पर निर्भय सिंह को कोई भ्रम नहीं रहा था और पक्का हो गया था कि वह कन्या रूपवती ही थी।“ठीक है, थोड़ा सब्र करो। चारेक कोस पर एक नदी है। वहाँ पहुंचकर जल पीते हैं।” निर्भय सिंह के गंभीर चेहरे पर खुशी की रंगत चढ़ गई थी।“जी अच्छी बात।” उस लड़की की निराशामयी आवाज़ में भी परिवर्तन आ गया था। अब उसमें से उत्साह और प्रसन्नता झलकती थी।
निर्भय सिंह ने चटकारी मारकर घोड़ी को और तेज़ कर दिया था। काबुली घोड़ी कोसों के कोस पीछे छोड़ती ठाठें मारती दरिया की तरह दौड़े जा रही थी।
रूपवती निर्भय सिंह की बचपन की सहेली और जवानी की प्रेमिका थी। रूपवती का पिता सेठ तिजौरी राम और निर्भय सिंह का पिता भाग सिंह कभी एक दूसरे के गहरे दोस्त हुआ करते थे। उनकी मित्रता तब से थी जब भाग सिंह अभी भाग मल ही होता था। दोनों मित्रों के विवाह एकसाथ ही हुए थे और इन्होंने यह बात उस समय ही तय कर ली थी कि वे अपने बच्चों के विवाह आपस में करके अपनी दोस्ती को समधियों के रिश्ते में बदल लेंगे। तिजौरी राम के तो गौना होने के एक वर्ष बाद ही एक बेटा भी हो गया था, पर भाग मल के बहुत समय तक कोई औलाद नहीं हुई थी। तिजौरी राम अक्सर अपने यार से मजाक करते हुए कहता, “भागमल, ज़रा जल्दी कर। ये न हो तेरी बेटी का इंतज़ार करता करता मेरा बेटा बूढ़ा हो जाए।”“अपनी तरफ से तो कोई ढीलापन नहीं तिजौरिये । मैं तो रोज ही चारपाई के पैताने की रस्सी ढीली कर देता हूँ। तेरी भाभी ही ढेरियाँ गिराये बैठी है।”“देख ले भाई, हिम्मत कर ले। नहीं तो यह न हो कि तेरी जगह भाभी को ढेरियाँ मुझे बनाकर देनी पड़े।”“हाँ, तूने तो साले ढेरी छोड़, टीले बना दिए होंगे ? बातें तो देखो ऐसी करता है जैसे बच्चों की कतार लगा दी हो। एक ही बच्चा हुआ है तुम्हारे। वो भी क्या पता तेरी बीवी मायके से लाई हो।” इस तरह भागमल भी तिजौरी राम को उसके व्यंग्य के उत्तर में ताना मारकर मजाक करता रहता था।दिन बीतते गए थे। फिर भाग मल के घर में निर्भय पैदा हुआ था। उन दोस्तों को लगा था, उनके रिश्तेदारी बनाने वाले मंसूबे पर जैसे पानी फिर गया हो। लड़के लड़के का विवाह वे कैसे कर सकते थे ? निर्भय सिंह के जन्म के तुरंत बाद ही भाग मल ने हिंदू धर्म छोड़कर सिक्खी स्वरूप धारण कर लिया था। भाग मल के भाग सिंह बनने का उनकी दोस्ती पर कोई अंतर नहीं पड़ा था। पहले की भांति ही उनका एक दूसरे के घर में आना-जाना जारी रहा था। उसके दो वर्ष बाद तिजौरी राम की पत्नी ने एक सुंदर कंजक को जन्म दिया था। उसके मनमोहक नयन-नक्श और सुंदर रूप देखकर ही तिजौरी राम ने उसका नाम रूपवती रखा था। जैसे जैसे रूपवती बड़ी होती गई थी, वह और भी अधिक खूबसूरत होती गई। निर्भय और रूपवती एकसाथ खेलते खेलते बड़े होते चले गए और फिर जब इनकी उम्र हुस्न-ओ-इश्क को समझने योग्य हो गई थी तो वे एक दूसरे के साथ प्रेमबंधन में बंध गए थे। उन्होंने एकसाथ जीने-मरने के कौल-इकरार कर लिए थे।जिस रियासत में वे रहते थे, वहाँ के राजा को क़त्ल करके किसी दूसरे को राज सिंहासन पर बिठा दिया गया था। नए राजा की पीठ पर बादशाह का हाथ था। नए कट्टर राजा ने इस्लाम के प्रसार के लिए अति उठा ली थी। उसने डंका बजाकर ऐलान करवा दिया था कि सात दिनों के अंदर अंदर सारी आवाम अपनी इच्छानुसार इस्लाम कबूल कर ले। जो उसकी बात नहीं मानेगा, उसका क़त्ल कर दिया जाएगा।सप्ताहभर की मोहलत का समय पूरा हो गया था। इक्का-दुक्का लोगों ने तो बिना किसी उज्र के इस्लाम को स्वीकार कर लिया था और जनेऊ उतारकर सुन्नतें करवा ली थीं। बाकी जो जिद्दी और हठधर्मी थे, वे अपनी कट्टरता और धर्म पर कायम रहे। उन निर्दोष लोगों को पकड़ पकड़कर कर उन पर अत्याचार किए जा रहे थे। चारों ओर हाहाकार मच गई थी। ऐसी परिस्थितियों में लोग अपनी जान और इज्ज़त बचाने के लिए अपने घरबार छोड़कर रियासत से बाहर भाग रहे थे। उन तूफानी दिनों में ही एक रात अंधेरे में तिजौरी राम का परिवार भी बिना किसी को कुछ बताये कहीं चला गया था।अपना धर्म न छोड़ने की हठ पर अड़े रहने वालो में से भाग सिंह भी एक था। इस कारण आठवीं रात को भाग सिंह के घर को सरकारी सिपाहियों ने शाही फरमानों का उल्लंघन करने के दोष में सजा देने की खातिर आग लगा दी थी। इस आग में भाग सिंह की पत्नी तो जलकर राख हो गई थी। पर वह और उसका पुत्र अपनी जान बचाकर निकलने में सफल हो गए थे। रियासत से भागकर उन्हें जंगलों में आकर छिपना पड़ा था। ऐसे ही उन्हीं की तरह अन्य सिख भी जंगल में आकर बस गए थे।इस तरह जब एक जगह बहुत सारे सिख एकत्र हो जाते तो वे अपने में से कुछ सिंहों को अलग करके उनका एक नया दल बना देते। यह नया बना दल किसी अन्य जंगल की ओर प्रस्थान कर जाता। भारी संख्या में सिंहों का एक जगह रहना उनके लिए परेशानियाँ उत्पन्न कर सकता था। क्योंकि जिस जंगल में जितने अधिक सिख जितनी देर से रह रहे होते, वहाँ उतनी ही जल्दी भोजन खत्म हो जाया करता था। एक जंग में मुगलों द्वारा हमला किए जाने से सारे सिख आसानी से खत्म किए जा सकते थे। इसलिए वे आम तौर पर कम गिनती के टोलों में बिखरकर रहा करते हैं। यदि एक दल शहीद हो जाता तो दूसरा सक्रिय हो जाता। इस प्रकार इन सिक्खों की मुहिम अग्रसर और सक्रिय रहती है। सिंहों की इसी नीति के कारण उनमें अनेक दल और कई मिसलें उपज गई हैं। यद्यपि आज छोटे छोटे दलों में बंटे होना इन सिखों की मज़बूरी और ज़रूरत है। पर कुछ वर्ष यदि ऐसा ही होता रहा तो ये नीति इनके रक्त में रच जाएगी और ये इस प्रकार इस विचारधारा के अभ्यस्त हो जाएँगे कि कभी भी एकजुट नहीं हो सकेंगे। छोटे-छोट कई दलों में अपने अपने आप को बांटकर रखना इनकी मानसिकता का भाग बन जाएगा। अपनी इस फितरत के कारण ये अपनी एकता और अखंडता को गवां बैठेंगे और हमेशा हुकूमत के साथ लड़ लड़ मरते रह जाएँगे। जिसके परिणामस्वरूप ये सिख कभी भी राज नहीं कर सकेंगे।तेज दौड़े जाती घोड़ी ने अपने आप ही अपनी रफ्तार थोड़ी-सी कम कर दी थी। रूपवती की पीठ का एक हिस्सा और कंधा निर्भय सिंह की छाती में बज रहा था। रूपवती की जांघों के साथ उसकी जांघ रगड़ा खा रही थी। शरीरों की रगड़ से रूपवती के अंदर भी उत्तेजना पैदा हो गई थी और निर्भय सिंह की नसें भी अकड़ गई थीं। रूपवती ने बेखौफ होकर अपना सिर निर्भय सिंह की छाती पर आहिस्ता से रख दिया था। उसने पीछे बैठे अपने दूल्हे की भी परवाह नहीं की थी। निर्भय सिंह ने भी पकड़ी हुई लगाम को ढीला छोड़कर सीने से लगी हुई रूपवती को अपनी बांहों में कस लिया था। दोनों शरीर स्वर्ग के झूले का आनन्द महसूस कर रहे थे।एक नदी के पास जाकर घोड़ी बहुत ही धीमी हो गई थी। निर्भय सिंह ने सचेत होकर बैठते हुए रूपवती के बदन से अपनी बांहों की पकड़ छोड़ दी थी। परंतु वह अभी भी निर्भय सिंह के साथ यूँ चिपकी पड़ी थी, जैसे उसके शरीर के साथ सिल दी गई हो। नदी के किनारे पर घोड़ी खड़ी करके निर्भय सिंह ने पहले रूपवती को नीचे उतारा था और फिर पीछे बैठा दूल्हा खुद ही उतर गया था। काठी पर से नीचे छलांग लगाकर निर्भय सिंह ने घोड़ी को भी पानी पीने के लिए छोड़ दिया था।वे तीनों जन पैरों के बल नदी के जल के पास जाकर बैठ गए थे। घुटने टेककर बैठते हुए रूपवती ने अपने लम्बे घूंघट को छोटा कर लिया था ताकि उसको जलपान करने में आसानी हो जाए। उसका अनढका सग्गीफूल किसी मस्जिद के स्वर्ण गुम्बद की तरह चमक रहा था।
साफ़ पानी में बहती थोड़ी बहुत गंदगी को हाथ से एक तरफ करके जब निर्भय सिंह ने पानी की अंजुरी भरी तो पानी में रूपवती का चेहरा देख वह उसे देखता ही रह गया था। उसका हुस्न पहले से कई गुना अधिक निखर आया था। अब तो वह बसरे की स्त्रियों से भी अधिक सुन्दर और बिल्कुल ही कोहकाफ़ की हूरों जैसी कोई हुस्नबानो लगती थी।रूपवती भी पानी में निर्भय सिंह के अक्स को निहार रही थी। अप्रत्यक्ष रूप से दोनों की नज़रें एक दूसरे से मिल रही थी। पानी में तैरते हुए रूपवती के दो नयन मशालों की भाँति जल रहे थे। रूपवती को अप्रत्यक्ष रूप से अपनी ओर देखते हुए पाकर निर्भय सिंह ने अपनी नज़रें झुका ली थी। निर्भय सिंह की अंजुरी से सारा पानी बूँद बूँद करके चू गया था। ठगे बैठे निर्भय सिंह का मन हुआ था कि वह जी भरकर रूपवती का दीदार करे। उसने पानी में झिलमिलाते रूपवती के मुख पर निगाहें गड़ा ली थीं। निर्भय सिंह ने न ही ध्यान हटाया था और न ही दूसरी अंजुरी पानी से भरी थी। रूपवती का सौन्दर्य देखकर ही उसकी प्यास मर गई थी। दीवानों की तरह टकटकी बांधे एक-दूजे को निहारते हुए वे दोनों यह भूल गए कि वहाँ कोई तीसरा भी है। वह एक दूसरे के दर्शनों के साथ भूख मिटाने लगे हुए थे।“वाह ! आनन्द आ गया पानी पीकर।”दूल्हे के शब्दों ने अरसे बाद मिले उन मुहब्बत में लीन प्रेमियों का, ध्यान रूपी वृक्ष जड़ से उखाड़ दिया। निर्भय सिंह ने एक घूंट भी भरकर नहीं देखा था। फिर भी गीले हाथों के साथ लबों को पोंछता हुआ झूठ बोला था, “हाँ, इस नदी का जल तो बहुत मीठा है। निरा शरबत जैसा !“रूपवती कुछ नहीं बोली थी। बस, गर्दन झुकाकर होंठों में मुस्कराती उठ खड़ी हुई थी। वे तीनों जन घोड़ी की ओर बढ़े जो पानी पीने के बाद एक तरफ जाकर घास चरने लग पड़ी थी। घोड़ी भी क्या करती ? घास को देखकर उस जानवर से भी नहीं रहा गया था। बहुत भूखी थी वह। सिंहों के साथ रहकर उस बेचारी को भी कई दिनों से फाके काटने पड़ रहे थे। अब घास देखकर वह अपनी भूख मिटा लेना चाहती थी। क्या मालूम, फिर कब क्या खाने को मिले। घास घोड़ी की शारीरिक ज़रूरत है। घोड़ी का चबर-चबर चलता मुँह देखकर निर्भय सिंह ने उसको पकड़ने की बजाय घास चरने की छूट दे दी थी।दूर दरख़्तों के झुंड में सूरज थका-सा सोने की तैयारी कर रहा था और चारों तरफ से जागता हुआ अँधेरा उठकर पांव के बल खड़ा होने लग पड़ा था। निर्भय सिंह ने इधर-उधर देख-परखकर दूल्हे को सलाह दी थी, “क्यों न आज की रात यहीं बिता ली जाए ?““हाँ, आप ठीक कहते हो। यह जगह कुछ सुरक्षित लगती है।” दूल्हे ने अपना सहमति जताई तो वे तीनों जन थोड़ा हटकर एक पीपल के नीचे चले गए थे। दूल्हा और दुल्हन लेटने के लिए जगह की सफाई करने लग पड़े और निर्भय सिंह खाने-पीने का प्रबंध करने में जुट गया था। आसपास के सारे वृक्ष फलों से भरे हुए थे। देखते देखते निर्भय सिंह अंगोछे में फलों की गठरी बांध लाया था। तीनों ने पेट भरकर फलों का सेवन किया था। तब तक घोड़ी भी चर कर हट गई थी। निर्भय सिंह ने घोड़ी को हरे पत्तों से लदे दरख़्त के एक तने से बांध दिया और उन दोनों को बेफिक्र होकर लेट जाने के लिए कहा था, “मैं पहरा देता हूँ, तुम दोनों सो जाओ।”साफ़ की हुई जगह पर आस पास से इकट्ठी की घासफूस बिछाकर उस पर उन्होंने केलों के बड़े पत्ते बिछा लिए थे। दूल्हा और दुल्हन उन बिस्तरों पर, एक-दूजे से कुछ फासले पर लेट गए थे और निर्भय सिंह थोड़ा हटकर एक पत्थर पर उनकी तरफ मुँह करके बैठ गया था। बेआरामी, थकावट और पेट भर खाया होने के कारण दूल्हे को शीघ्र ही नींद आ गई थी। रूपवती ने भी काफी देर से करवट नहीं बदली थी। वह भी सो गई थी शायद।धीमी धीमी-सी जंगली जानवरों की आवाज़ें आ रही थीं। झींगुर तेज़ आवाज़ कर रहे थे। दूल्हे के खर्राटे सुनाई दे रहे थे। और सबसे अधिक शोरोगुल तो निर्भय सिंह के अंदर मचा हुआ था। उसका वजूद बेशक शांत था, पर उसका मन बेचैन सा दौड़ता फिरता था। इतनी रफ्तार से जैसे कोई पहाड़ से छोड़ा हुआ गड्डा नीचे को लुढ़कता है।रूपवती ने अपना गजभर लम्बा घूंघट सोते समय उतार दिया था या शायद हवा के झोंके से खुद-ब-खुद उतर गया था। निर्भय सिंह ने सरसरी नज़र से रूपवती को देखा तो उसका चेहरा अनढका था। सुहाग जोड़े में लिपटी, गहनों से सजी-धजी रूपवती कोई मल्लिका प्रतीत होती थी। पूरनमासी का चाँद भी मानो रूपवती का रूप देखने के लिए पूरे का पूरा निकला हुआ था। सितारों से लदा आसमान भी रूपवती के ऊपर गिरने को उतावला हुआ लगता था। सारी कायनात उसके सौंदर्य पर मोहित हुई पड़ी थी।शायद, रात के पास अँधेरा खत्म हो गया था या यह रूपवती के जोबन का उजाला था कि निर्भय सिंह को चाँदनी रात में उसका अंग-अंग स्पष्ट दिख रहा था। रूपवती का नरम, कोमल बदन धूप में पड़े काँच की भाँति चमक रहा था और ओस से भीगे फूलों की तरह महक रहा था। निर्भय सिंह ने अपनी जांघों के बीच हाथ देकर उन्हें पूरी ताकत के साथ भींच लिया था। उसके सारे शरीर में थरथराहट-सी आ गई थी।निर्भय सिंह बेखौफ़ होकर रूपवती को टकटकी लगाकर देखता रहा था। अब वह पहले की अपेक्षा कई गुना हसीन हो गई लगती थी। निर्भय सिंह को एक-एक करके वे सब पल याद आने लगे जो कभी उसने रूपवती के साथ मुहब्बत करते हुए बिताये थे।... घड़ा उठवाते समय घड़ा टूटने पर (या जानबूझ कर तोड़ा था) सारा पानी रूपवती के ऊपर गिर गया था और उसके सारे कपड़े गीले हो गए थे। पानी में भीगकर उसके जोबन का रंग और भी उघड़ आया था। पेड़ों पर चढ़कर आम तोड़ती रूपवती टहनी टूटने पर जब नीचे गिरने लगी थी तो उसने बांहों में लपककर छोड़ने की अपेक्षा और ज्यादा कसकर पकड़ लिया था। रातभर बारिश में भीगते हुए एक-दूसरे के जिस्म से जिस्म जोड़े बैलगाड़ी पर पड़े रहे थे।... और... और...और...निर्भय सिंह प्यार से रूपवती को निहार ही रहा था कि हवा का एक तेज झोंका आया था और रूपवती की लट उसके मुखड़े पर आ गिरी थी। सांपों जैसे काले-स्याह घने बालों के साथ पूरा का पूरा चेहरा ढंका गया था। निर्भय सिंह उसको जी भरकर देखना चाहता था। अपनी इच्छा पूरी करने के लिए धीरे-धीरे उसके पास खिसककर जब वह रूपवती की लट को पकड़कर हटाने लगा था तो रूपवती ने झपट कर उसको आलिंगन में ले लिया था और आहिस्ता आहिस्ता आँखें खोलती हुई आनंद के अतिरेक में फुसफुसाई थी, “निर्भय...कहाँ था तू ?“निर्भय सिंह ने रूपवती के ऊपर अपना शरीर जैसे ही ढीला छोड़ा था, वैसे ही वह अकड़ गया था। मानो मांस का नहीं बल्कि जिस्त या किसी अन्य ठोस धातु का बन गया हो। विशेषकर उसका काम-अंग। रात के अँधेरे में शरीरों पर वासना की आँधी बह रही थी। एक-दूसरे को ताबड़तोड़ वे बेसब्रे से चूमने लगे थे। कामुकता के साथ भरी हुई दोनों देहें बिखर गई थीं। निभर्य सिंह के पाँचों ककार त्यागते ही पाँचों विकार उसे आ चिपटे थे। घोड़ी चबर-चबर चरे जा रही थी।
रूपवती के रूप को आनन्द उठाकर निर्भय सिंह को लगता था जैसे उसने लाहौर के तख़्त को हथिया लिया हो।निर्भय सिंह के कपड़े रूपवती के कपड़ों के साथ गुच्छा-मुच्छा हुए पड़े थे। सलीके से उतारकर एक तरफ रखे हुए जनाना गहने सरबलौह के कड़े में उलझे हुए थे और उनके समीप ही निर्भय सिंह की गातरे वाली किरपान रूपवती की कटार के ऐन ऊपर पड़ी थी। निर्भय सिंह और रूपवती दोनों के जिस्म एक दूसरे के साथ लिपटे एक होकर कुल आलम से बेख़बर और बेखौफ़ सोये पड़े थे।रात के अंतिम पहर में जाकर सोये होने के कारण रूपवती और निर्भय सिंह दिन चढ़ जाने के बावजूद अभी तक गहरी नींद में थे।पूरी रात भरपूर नीदं का आनन्द लेने के बाद दूल्हे की आँख खुल गई थी। रूपवती और निर्भय सिंह को इस आपत्तिजनक स्थिति में देखकर वह गुस्से में कांपने लगा था। गुस्से में लाल-पीला होकर वह निर्भय सिंह से जा चिपटा था और गालियाँ बकता हुआ मुक्के मारने लगा था। निर्भय सिंह जाग पड़ा था और जवाब में दूल्हे के साथ भिड़ पड़ा था। उसके साथ गुत्थम गुत्था हुए निर्भय सिंह ने उसको तारे दिखा दिए थे। दूल्हा शारीरिक तौर पर कमज़ोर था और निर्भय सिंह तगड़ा था। ऊपर से निर्भय सिंह ने युद्धकला में निपुणता प्राप्त की हुई थी। निर्भय सिंह ने दूल्हे को मामूली-से संघर्ष के बाद काबू में कर लिया था और अपनी पगड़ी से उसको पेड़ के साथ बांध दिया था।शोर सुनकर तभी रूपवती भी जाग पड़ी थी। निर्भय सिंह ने उसको सारी बात बताई थी तो रूपवती ने बंधे हुए दूल्हे के मुँह पर थूका था, “हुं...बड़ा अणखी मर्द बनता है। जब मुगल मुझे छीनकर ले जा रहे थे, उस वक्त तेरे क्या हाथ टूटे थे ? उस समय दिखाता बहादुरी ? तब तो उन बापों के आगे आवाज़ भी न निकली थी तेरी। मुँह में जैसे ताला लग गया था। क्या सांप सूंघ गया था तेरी दिलेरी को ? नामर्द, तूने तो अग्नि को साक्षी मानकर मेरी रक्षा करने की जिम्मेदारी ली थी।”बंधा होने के कारण पहले तो खुलने के लिए वह छटपटा रहा था, पर रूपवती के ताना मारने पर वह गर्दन झुकाकर यूँ शांत हो गया था मानो उसके अंदर से प्राण ही निकल गए हों।
दूल्हे की ओर से निश्चिंत होकर निर्भय सिंह नदी पर नहाने चला गया था। दूल्हें के साथ लड़ते-जूझते नीचे ज़मीन पर लेटने के कारण उसका सारा बदन मिट्टी से सन गया था। पानी में नहाते हुए एक लम्बी डुबकी लगाकर जब वह ऊपर उठा था तो उसने देखा था कि रूपवती भी उधर ही नहाने आ रही थी। गौरी-चिट्टी रूपवती अलफ़ नग्न अवस्था में काफी देर तक नदी के किनारे कमर पर हाथ रख खड़ी होकर निर्भय सिंह की तरफ देखती रही थी। गोया वह निर्भय सिंह के आमंत्रण की प्रतीक्षा कर रही हो। निर्भय सिंह ने आँख के इशारे से रूपवती को अपने पास बुलाया था और वे दोनों एक भूखे द्वारा आम चूसने की तरह एक-दूजे को ताबड़तोड़ चूमने लग पड़े थे। नदी के शांत जल में तूफानी लहरें पैदा होने लग पड़ी थीं मानो कोई मथनी डालकर चाटी वाले दूध को बिलो रहा हो। निर्भय सिंह और रूपवती में एक दूसरे से कसकर लिपटे हुए थे।निर्भय सिंह बाहों में उठाकर रूपवती को पानी से बाहर ले आया था। दोनों के तन पर एक भी वस्त्र नहीं था। जहाँ वह रात को लेटे थे, निर्भय सिंह पानी से निचुड़ती रूपवती को वहीं पत्तों के बिछौने पर लिटाने लगा था। पर बंधे हुए दूल्हे को देखकर वह रुक गया था। झिझक गया था। झिझक गया था या कह लो, वह शरमा गया था। दूल्हे से ओट करने के विचार से वह दूसरी तरफ मुड़ने लगा था। निर्भय सिंह की बांहों में लेटी पड़ी रूपवती गर्दन ऊपर उठाती हुई बोली थी, “नहीं निर्भय, रूको मुझे यहीं उतार दो।”निर्भय सिंह ने उसे उतार दिया । पैरों के बल खड़ी होते ही रूपवती ने पहले तो नफ़रत भरी नज़र से दूल्हे की तरफ देखा था और ‘हुँ…’कहकर मुँह निर्भय सिंह की ओर घुमाकर उसको प्रेमपूर्वक देखने लग पड़ी थी, “ऐ मेरे प्रीतम, औरत उस पुरुष की होती है जो उसकी रक्षा कर सके और उसकी ज़रूरतों को पूरा कर सके।...समझे ? सभी ज़रूरतें ।”रूपवती द्वारा कहे ‘सभी ज़रूरतों’ के कथन में कोई गहरी छेड़खानी थी। जिसको मूर्ख से मूर्ख और उजड्ड से उजड्ड मर्द भी समझने में भूल नहीं कर सकता था(बशर्ते कि वह आदमी नपुंसक न हो)। निर्भय सिंह भी रूपवती का इरादा समझ गया था। उसने रूपवती को अपनी बांहों में कस लिया था, “तू बहुत सुन्दर है रूपवती।”“कम तो आप भी नहीं मेरे सरताज।”“मेरा तो तुझसे नज़र हटाकर और कुछ भी देखने को मन नहीं करता।”“मुझे तो और कुछ दिखता ही नहीं। अंधी हो गई हूँ आपको देखकर।” रूपवती की नशीली आवाज़ निकली थी।“मन करता है तेरे खूबसूरत बदन को सुबह से रात तक और रात से सुबह तक हर समय चूमता रहूँ... चूमता रहूँ। बस चूमता ही जाऊँ और हटूं नहीं।”“फिर चूमो न। देर किस बात की है ? आपको हटाता ही कौन है ? चूमो...चाटो...भोगो... जो आपका दिल चाहता है, वो करो। पर मेरे हुजूर कुछ न कुछ करो ज़रूर।” रूपवती ने निहोरा-सा मारकर अपने होंठ निर्भय सिंह के अधरों पर रख दिए थे। रूपवती के होंठ म्यान में पड़ी किरपाण की तरह निर्भय सिंह के मुँह में फंसे पड़े थे। निर्भय सिंह शराबी होता जा रहा था और रूपवती मदहोश होती जा रही थी। रूपवती ने निर्भय सिंह को नीचे लिटा लिया था और स्वयं उसके ऊपर पड़ गई थी। रूपवती के नीचे लेटे निर्भय सिंह को यूँ लगता था जैसे वह हिंदुस्तान के सिंहासन पर बैठा हो। दौड़े जाते अरबी घोड़े के सवार की भाँति निर्भय सिंह के ऊपर चढ़ी रूपवती हिल रही थी। कामवेग में आई हुई रूपवती का शहतूत की टहनी की तरह मुड़-मुड़ जाता लचकीला जिस्म निर्भय सिंह के शरीर पर यूँ बज रहा प्रतीत होता था मानो ढाल और तलवार आपस में टकरा रहे हों। उनका देह रूपी नगाड़ा ज़ोर ज़ोर से बज रहा था। घोड़ी घास में चबर-चबर मुँह मारे जा रही थी।
सूरज छह बार अस्त और पाँच बार उदय हो चुका था। इतना समय कब और कैसे गुज़र गया था, इसका न निर्भय सिंह को इल्म हुआ था और न ही रूपवती को। इन बीते दिनों में उन्होंने सहवास के सिवाय और कुछ नहीं किया था। उनके पास करने के लिए कुछ था भी नहीं। अब किसी भी स्थिति में निर्भय सिंह रूपवती के साथ और नहीं रह सकता था। उसको वापस अपनी मिसल में लौटना ही लौटना था। पीछे जत्थे में सिंह उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। इन बीते दिनों में रूपवती निर्भय सिंह की कमज़ोरी बन चुकी थी। उसका रूपवती से हमेशा हमेशा के लिए अलग होने को मन नहीं करता था। परन्तु हक़ीकत को नकारा भी नहीं जा सकता था। निर्भय सिंह को अवश्य ही रूपवती से बिछड़ना पड़ना था। रूपवती को छोड़ना अब निर्भय सिंह के लिए सबसे बड़ी समस्या थी। समस्या तो दरअसल यह थी कि वह रूपवती को छोड़ना ही नहीं चाहता था। निर्भय सिंह चाहता था कि रूपवती को वह किसी ऐसी जगह ठहरा आए, जहाँ उनका परस्पर निरंतर सम्पर्क होता रहे। ऐसी गुप्त जगह कौन सी हो सकती है ? सोचते सोचते निर्भय सिंह को अब्दुल करीम याद हो आया था। अब्दुल करीम निकट की रियासत में निर्भय सिंह का वफादार मुसलमान था जो कभी कभार सिंहों के लिए हथियार और खाने आदि की रसद का प्रबंध करके दिया करता था। निर्भय सिंह का अब्दुल करीम के घर आना-जाना आम था। अब्दुल करीम की याद आते ही निर्भय सिंह ने निर्णय कर लिया था कि वह रूपवती को अब्दुल करीम के घर छोड़ आएगा। रूपवती उसके परिवार के साथ एक सदस्य बनकर रहा करेगी। महीने बीस दिन बाद जब हथियार आदि लेने जाया करेगा तो वह एक दो रातें रूपवती के संग बिता आया करेगा।जब अपने मंसूब के बारे में निर्भय सिंह ने रूपवती को बताया था तो उसने भी इस योजना को स्वीकार कर लिया था।कूच करने की सब तैयारी कर लेने के बाद घोड़ी और काठी कसते हुए निर्भय सिंह ने रूपवती को दूल्हे की तरफ इशारा करके पूछा, “इसका क्या करें ?“दूल्हे की तरफ कठोर दृष्टि डालते हुए रूपवती अपनी नफ़रत उगलने लगी थी, “इसे जान से मारकर फेंक जाते हैं। जंगली जानवर अपने आप खा लेंगे।”निर्भय सिंह को रूपवती की सलाह जच गई थी। वह किरपान खींचकर जैसे दूल्हे की ओर बढ़ने लगा तो घोड़ी ने हिनहिनाना शुरू कर दिया। निर्भय सिंह ने पीछे मुड़कर घोड़ी को पुचकारा था, परंतु वह फिर भी चुप नहीं कर रही थी और उछलने-कूदने लग पड़ी थी। निर्भय सिंह समझ गया था कि यह किसी अज्ञात खतरे का सूचक था। निर्भय सिंह ने कान खड़े करके ध्यान से आसपास की आवाज़ को सुनने का प्रयत्न किया था। उसको अपनी ओर बढ़ती आती कई घोड़ों की टापों की आवाज़ें सुनाई दी थीं। वह समझ गया था कि अवश्य ही मुगल उधर आ रहे थे। निर्भय सिंह अकेला और ऊपर से रूपवती जैसी खूबसूरत स्त्री थी। मुगलों की संख्या की उसको कोई जानकारी नहीं थी। मुगल निर्भय सिंह को मौत के घाट उतार सकते थे। रूपवती की इज्ज़त लूट सकते थे। ज़ोरावर हमलावरों के समूह के साथ वह अकेला मुकाबला कर पाने में समर्थ नहीं था। ऐसी स्थिति में कुछ भी घटित हो सकता था। क्या पता, वह कितनी संख्या में हों ?निर्भय सिंह ने पेड़ से बंधी घोड़ी को खोला था और फुर्ती के साथ रूपवती को उस पर बिठा लिया था। दूल्हा निर्भय सिंह का सारा राज जान चुका था, इसलिए उसको जीवित नहीं छोड़ा जा सकता था। निर्भय सिंह तेजी से दौड़कर गया था और दूल्हें पर अंधाधुंध वार करने लग पड़ा था।उधर हमलावरों के घोड़े बहुत करीब आ गए थे। दूल्हा बुरी तरह ज़ख़्मी हो गया था। उसको मरने वाली हालत में देखकर निर्भय सिंह ने अपनी पगड़ी खोली थी। पगड़ी के खोलते ही पेड़ से बंधा दूल्हा धड़ाम से धरती पर गिर पड़ा था। भागकर निर्भय सिंह घोड़ी पर सवार हो गया था। घोड़ी हवा बन गई थी।दौड़ती हुई घोड़ी पर बैठे निर्भय सिंह ने लगाम रूपवती को सौंपकर अपने बाल बिखेरकर अपनी पगड़ी मुगलों की तरह बांध ली थी। वेषभूषा और वस्त्रों से वह सिक्ख नहीं, बल्कि पठान ही लगता था। रूपवती उसकी छाती के साथ पीठ टिकाये बैठी थी। निर्भय सिंह ने लगाम वापस अपने हाथ में लेकर रूपवती को अपनी बांहों में कस लिया था और घोड़ी को और तेज भगाने लग पड़ा था। घोड़ी जंगल-टीलों को चीरती, पैरों तले रौंदती उड़ी जा रही थी।सात दिन होने जा रहे हैं और निर्भय सिंह अभी तक वापस नहीं लौटा है। जत्थेदार भाग सिंह को उसकी चिंता हो रही है। यद्यपि अब तक वह पुत्रमोह को काफी हद तक मार चुका है। परंतु, फिर भी उसके दिल के किसी कोने में मोह-प्रेम की कुछ तारें अभी साबुत बची हुई हैं। पुत्र प्रेम उसके हृदय में उमड़ रहा है। बड़ी मुश्किलों और दोज़खों के साथ उसे इस पुत्रधन की प्राप्ति हुई थी। भाग सिंह द्वारा हिंदू धर्म त्यागकर सिक्ख बनने के पीछे निर्भय सिंह ही सबसे बड़ा कारण था। मंदिरों, मठों, डेरों और मस्जिदों से मायूस होकर उसने गुरूद्वारे में सुखना सुखी थी कि यदि वाहेगुरू पुत्र की खुशी बख़्श दे तो वह पुत्र सहित खुद भी सिक्ख सज जाएगा। और फिर ऐसा ही हुआ था।निर्भय सिंह की प्रतीक्षा में व्याकुल होकर जत्थेदार भाग सिंह ने दो सिंह उसकी तलाश में भेज दिए थे। अभी तक न खोजी सिख वापस लौटे हैं और न ही निर्भय सिंह का कोई अता पता है। बीड़ की ओर आती सूनी 

पगडंडियों पर निगाहें टिकाये जत्थेदार भाग सिंह ‘जपुजी साहिब की पौड़ी’ फिर भूल गया और वह पिछली पौड़ी से पुनः शुरू करके पाठ करने लग पड़ा है। पहले कभी बाणी पढ़ते समय जत्थेदार भाग सिंह का मन नहीं उखड़ा था। आधे से अधिक श्री ग्रंथ साहिब उसको मुँह-जबानी याद है। पाँच बाणियाँ तो जैसे उसके रोम रोम में रची बसी हैं। जीवन में आज पहली बार ऐसा हुआ है कि जत्थेदार भाग सिंह का ध्यान भक्ति में नहीं लग रहा। उसका मन भटक रहा है। वह जल बिन मछली की तरह तड़प रहा है।दोपहर भी बीत चली है। सारा जत्था दिनभर से निर्भय सिंह और उसको खोजने गए सिंहों की राह देख रहा है। जब प्रतीक्षा करता करता जत्थेदार ऊब जाता है तो सबसे ऊँचे दरख़्त के शिखर पर चढ़कर दूर दूर तक निगाहें दौड़ा लेता है। क्या पता, उसको निर्भय सिंह आता दिखाई दे जाए। लेकिन नहीं, उसको कुछ भी दिखलाई नहीं देता। विशेषकर वो जिसे देखने का वह इच्छुक है। भूख से भाग सिंह का पेट कुलबुला रहा है। पिछले दो दिनों से उसने अन्न का एक दाना भी मुँह में नहीं डाला। अब भूख उसकी सहन-सीमा से बाहर हो रही है। उसने चोगे के खीसे में हाथ डालकर चने के दाने निकाल लिए। भूख तो इतनी अधिक थी कि उसका मन करता था कि सारे के सारे दानों को फांक ले। पर फिर उसको ख़याल आया कि न जाने और कितने दिन उसको इसी मुट्ठीभर दानों पर गुज़ारा करना पड़े। वह दानों को मुँह में डालते डालते रुक गया।


उसने सिर्फ़ एक दाना मुँह में उछालकर फेंका और बाकी के सारे दाने उसने वापस जेब के हवाले कर दिए।संध्या समय निर्भय सिंह की खोज में निकले सिंह वापस लौट आए और अपने साथ अधमरे और कराहते दूल्हे को भी ले आए। निर्भय सिंह को खोजते हुए जब सिंह जल की तलाश में एक नदी के पास पहुँचे थे तो वहाँ उन्हें ताज़ा-ताज़ा घायल हुआ दूल्हा मिला था। निर्भय सिंह अभी कुछ देर पहले ही उसको घायल करके फरार हुआ था। दूल्हे को ज़ख़्मी करते हुए निर्भय सिंह को जो घोड़ों की पदचाप सुनाई दी थी, वे घोड़े मुगलों के नहीं, बल्कि सिंहों के थे। अभी तक दूल्हा मरा नहीं था। उसकी नब्ज़ चल रही थी। सिंह उसको जैसे-तैसे अपने डेरे तक ले आए थे। अब भी वह कराह रहा है। दूल्हे ने जत्थेदार भाग सिंह को सारी आपबीती बताई तो जत्थेदार को विश्वास ही नहीं हुआ, “तू सच कह रहा है ?“

“हाँ हुजूर ! मुझे अपना अंत दिखाई दे रहा है। मरने वाला व्यक्ति कभी झूठ नहीं बोलता।” दूल्हे ने तीखे दर्द और कठिनाई को झेलते हुए कहा।जत्थेदार भाग सिंह के तन बदन में आग लग गई। उसका सिर लज्जा से अपने साथियों के सम्मुख झुक गया। उस में किसी से आँख मिलाने की भी हिम्मत नहीं रही है।

जत्थेदार भाग सिंह ने दूल्हे को इलाज के लिए जत्थे के वैद्य के हवाले कर दिया।ज्ञानी वैद्य के मरहम-पट्टी और उपचार करने पर दूल्हे की जान को बचा लिया गया है।दूल्हे को लेकर आते हुए सिंह एक मृग को मार कर भी ले आए थे। महाप्रसाद के लिए उसको भूनने की खातिर आग पर चढ़ाकर सब ‘रहिरास साहब’ का पाठ करने में जुट गए थे।उधर रूपवती को छोड़कर निर्भय सिंह यूँ प्रसन्नचित लौट रहा है मानो दिल्ली के किले पर झंडा गाड़कर वापस आ रहा हो।निर्भय सिंह को बीड़ तक पहुँचते गहरी शाम हो गई है। जब वह डेरे में पहुँचा तो उसका पिता जत्थेदार भाग सिंह और अन्य सिंह संध्या का पाठ सम्पन्न करके अरदास करने के लिए खड़े हो गए थे।निर्भय सिंह ने सोचा कि वे अरदास खत्म होने तक सबके पीछे ही खड़ा रहेगा। पर उसकी घोड़ी हिनहिना पड़ी तो सभी की नज़रें घोड़ी और निर्भय सिंह की ओर उठ गईं। निर्भय सिंह इरादा बदलकर आगे बढ़ा। उसने जत्थेदार भाग सिंह और अन्य साथियों को फतह बुलाई, “वाहिगुरू जी का खालसा…“

“वाहिगुरू जी की फतह।” सभी ने जवाब दिया।जत्थेदार भाग सिंह ने गरजकर पूछा, “आ गया ?“

“जी हाँ। आपका हुक्म पूरा करके आया हूँ।”

“दूल्हा-दुल्हन अपने घर सुरक्षित पहुँच गए ,“ जत्थेदार भाग सिंह ने चालाकी से उसको कुरेदना चाहा।

निर्भय सिंह ने विनम्रता से गर्दन झुका हाथ जोड़ते हुए उत्तर दिया, “जी हाँ।”

“दोनों ,“ जत्थेदार ने पुनः उसको कुरेदा।निर्भय सिंह चतुराई से फौरन बोला, “हाँ जी, दोनों। मैं खुद उन्हें उनके घर-परिवार में छोड़कर आया हूँ। सब बहुत खुश हुए और उनके परिवार ने खालसा फौज के लिए धन्यवाद भेजा है।”

“झूठ बोलता है ? यदि तू उन्हें छोड़ आया है तो फिर वो कौन है ?“ जत्थेदार भाग सिंह ने कुछ दूरी पर पट्टियों से बंधे पड़े दूल्हे की ओर उंगली की।निर्भय सिंह झूठा पड़ने के कारण घबरा गया। दूल्हे के जिन्दा बच जाने की तो उसको ज़रा भी आस नहीं थी।

“बोल, इसकी यह हालत तूने की है ?“ जत्थेदार भाग सिंह ने म्यान में से अपनी तलवार खींच ली।निर्भय सिंह ने गर्दन झुकाकर हाथ जोड़ लिए, “जी हाँ, मुझसे यह गलती हो गई है।”“गलती हुई है तो सजा भी भुगत।”सजा के बारे में सुनते जैसे ही निर्भय सिंह ने चौंककर गर्दन ऊपर उठाई तो पिता भाग सिंह ने तलवार की मूठ को कसकर पकड़ा और ‘खचाक’ करके एक ही वार से पुत्र निर्भय सिंह की गर्दन काट डाली। सिर के अलग होते ही निर्भय सिंह का धड़ भी ज़मीन पर गिर पड़ा। सभी आँखें फाड़कर निर्भय सिंह के धरती पर तरबूज की तरह लुढ़कते शीश की तरफ देखने लगे। जत्थेदार भाग सिंह ने आसपास खड़े सभी साथियों की ओर देखा और गर्व के साथ रक्त से रंगी 

तलवार वापस म्यान में डालते हुए बोला, “खालसा फौज को ऐसे धोखेबाज, झूठे और चरित्र के कच्चे सिपाहियों की कोई ज़रूरत नहीं। हमारे लिए आवश्यक है कि हम अपने दुश्मन को पहचानकर दंड दें और अगर हमने ऐसा न किया तो हमारा संघर्ष बदनाम हो जाएगा। संघर्ष बदनाम हो गया तो लोगों का समर्थन हमसे टूट जाएगा। जब लोगों का समर्थन हमसे टूट गया तो हमारी मुहिम वहीं ठप्प हो जाएगी। हम वहीं हार जाएंगे। इसलिए हमें ऐसे रोगग्रस्त आदमी को चुनकर बाहर कर देना चाहिए। सड़ा हुआ सेव दूसरे अच्छे सेवों को भी खराब कर देता है।”सब ने जत्थेदार भाग सिंह के आगे सत्कार में गर्दनें झुका लीं। जत्थेदार भाग सिंह ने अपना सिर गर्व से ऊपर उठाया और ‘एकओंकर’ उच्चारते हुए अरदास आरंभ कर दी।


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